नई शिक्षा नीति व शिक्षक-शिक्षा: पढ़ने-पढ़ाने और सीखने की व्यावहारिक प्रणाली विकसित करना हो उद्देश्य शिक्षकों को करना होगा आधुनिक मानकों को आत्मसात
21वीं सदी केवल शिक्षार्थियों के लिए ही नहीं, वरन शिक्षकों के लिए भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। यह एक ऐसा अवसर है जहां शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ही ज्ञान की नूतन विषय-वस्तुओं एवं संदर्भों के साथ पहली बार अंतर्क्रिया कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का दस्तावेज इस रूप में भी विशिष्ट है कि यह नीति, रीति और संदर्भ में स्वयं ही अपने क्रियान्वयन की रणनीतियों एवं प्रक्रियाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। इस आलोक में शिक्षा नीति के सफल संचालन की जिम्मेदारी और जवाबदेही शिक्षा संस्थानों और शिक्षकों की हो जाती है। विश्वस्तरीय गुणात्मक शैक्षिक संस्थाओं के अभाव से जूझ रहे भारतीय अकादमिक जगत के लिए यह एक सुअवसर है जहां वह अपने सम्पूर्ण कलेवर यानी संरचना, प्रक्रिया, विनियम, पाठ्यक्रम, अनुसंधान, संसाधन आदि को नए अर्थ-संदर्भों में पुन: संरचित करते हुए और अधिक प्रासंगिक बना सके।
स शिक्षा नीति ने शिक्षकों पर सर्वाधिक भरोसा किया है बावजूद इसके कि शिक्षक-शिक्षा के मूल्यांकन के लिए गठित न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा कमेटी (2012) की रिपोर्ट यह बताती है कि अयोग्य शिक्षक तैयार करके हम देश के 37 करोड़ से अधिक बच्चों को खतरे में डाल रहे हैं। शिक्षकों में सीखने के प्रति उपेक्षा, अपनी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन न कर पाना और अपनी नेतृत्व क्षमता के प्रति अविश्वास के कारण ही शिक्षक स्वयं को एक ‘सामाजिक परिवर्तनकर्ता’ के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सके हैं। मसलन अधिकांश शिक्षकों के पास स्व-मूल्यांकन के प्रति कोई व्यवस्थित, ज्ञानात्मक एवं संरचनात्मक दृष्टि नहीं है, जिसके आधार पर वे अपने उत्तरोत्तर विकास को देख सकें। शिक्षण संस्थानों में मौजूद ‘संरचनात्मक जड़ता, बौद्धिक पदानुक्रम एवं सीखने की संस्कृति’ का अभाव भी अक्सर शिक्षकों को सीखने से रोकता है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षकों को उनकी वर्तमान पारम्परिक एवं जड़ कार्य-संस्कृति, असुरक्षित सेवा स्थितियां एवं अपर्याप्त वेतन देने जैसे विभिन्न प्रकार के उत्पीड़नों आदि से बाहर निकालने में समर्थ है। भारतीय कक्षाओं में बेहतर न सीख पाने की स्थितियों के लिए शिक्षकों को दोष देने के बजाय, यह शिक्षा नीति, शिक्षकों की गुणवत्ता और उनमें प्रेरणा की कमी के लिए शिक्षक-शिक्षा, असुरक्षित सेवा नियोजन, कार्य संस्कृति के अभाव, असम्मानजनक सेवा शर्तों आदि के परिणामस्वरूप विकसित हुई निराशाजनक कार्यात्मक संरचनाओं व स्थितियों को जिम्मेदार ठहराती है।
21वीं सदी केवल शिक्षार्थियों के लिए ही नहीं, वरन शिक्षकों के लिए भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। यह एक ऐसा अवसर है जहां शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ही ज्ञान की नूतन विषय-वस्तुओं एवं संदर्भों के साथ पहली बार अंतर्क्रिया कर रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा, मशीन-अधिगम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अवधारणा दोनों के लिए ही नवीन है। वैश्विक स्तर पर पिछले कई दशकों से ‘शिक्षक’ और ‘शिक्षण व्यवसाय’ चिंता का विषय बना हुआ है। भारत में लगभग 97 लाख शिक्षकों की व्यावसायिक भूमिका व पहचान को स्कूली शिक्षा के विस्तार ने विविधतापूर्ण और चुनौतीपूर्ण बताया है (नो टीचर-नो क्लास, यूनेस्को रिपोर्ट-2021)। ऐसे में भारतीय शिक्षकों से ‘पारम्परिक गुरु’ व ‘आधुनिक शिक्षाशास्त्र के ज्ञान’ से संपन्न और समृद्ध होने की उम्मीद की जाती है। वस्तुत: अध्यापकों के लिए व्यावसायिक मानक विकसित करने का प्रमुख उद्देश्य शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी मानकों का निर्माण करना है। इस क्रम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के पैरा क्रमांक 5.20 के आलोक में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने शिक्षकों के लिए व्यावसायिक मानकों पर एक प्रारूप तैयार किया है जो शिक्षक गुणवत्ता के गठन के लिए सार्वजनिक संकल्प-पत्र है।
बौद्धिक रचनात्मकता के इस माहौल में शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों और शैक्षिक नेतृत्व को अपने परंपरागत क्षेत्र से बाहर आकर व्यावहारिक अधिगम प्रणाली विकसित करने के लिए आधुनिक व्यावसायिक मानकों को आत्मसात करना होगा। वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचारों के लिए ऐसे पारिस्थितिकी-तंत्र और ऐसी कार्य-संस्कृति को विकसित और पोषित करना होगा जिससे संसाधनों के भागीदारीपूर्ण सृजन के साथ लोकतांत्रिक एवं समतामूलक वितरण भी सुनिश्चित हो सके। ऐसा करके ही 21वीं सदी का शिक्षक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का माध्यम बनते हुए व्यक्ति, समाज और मानवता को साभ्यतिक सार्थकता प्रदान कर सकेगा। शिक्षकों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे एक दूसरे से सीखते हुए स्वयं को समृद्ध, नवाचारी और जीवंत बनाए रखें। ऐसा करके ही वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों को पूरा कर सकेंगे।
शिक्षा नीति इस बात पर सहमत दिखती है कि बेहतर शिक्षक पैदा नहीं होते, बल्कि प्रशिक्षणों के माध्यम से तैयार किए जाते है। ऐसी वैचारिकी ही विलक्षण एवं चिंतनशील आधुनिक युवा पीढ़ी को शिक्षक-शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकेगी। भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियां ही इस शिक्षा नीति की व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। मसलन 2030 तक 2 करोड़ बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाना, माध्यमिक शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच और सौ प्रतिशत नामांकन के साथ-साथ, 2035 तक उच्चतर शिक्षा में 50 प्रतिशत नामांकन को सुनिश्चित करना तथा शिक्षा पर व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 1.7% से बढ़ाकर 6% तक करना इस शिक्षा-नीति के सांख्यिकीय संकल्प हैं। वस्तुत: भारतीय जन संस्कृति, ज्ञान, न्याय और समता की साधना को अभीष्ट के रूप में आत्मसात करने की प्रेरणा को निष्ठा में बदलने का ‘प्रशासनिक सर्कुलर’ नहीं बल्कि ‘जन संकल्प-पत्र’ है नई नीति।
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